आज फिर कुछ पत्तों को ज़मीं पर बरसते देखा
फिर शाम के सायेमे गुजरते लम्होंको देखा
हवाओं की सरसराहट में सुनी कुछ गीतोंकी धुन
और फिर मौसम के बदलते रंगोंसे भीगा मेरा मन
आसमान मचलता गया..उठी सागरकी लहरे
कुछ मेरा दिल भी खो गया उठी गम की कुछ लहरे
ऐ रुपहले चाँद तू क्यों है इतना खामोश
सितारोंकी गर्दिश में लगता है तू मदहोश
लगते हो ऐ चाँद तुम भी कुछ तनहा तनहा
लगता है तेरी चाँदनीके गम की हुई है आज इन्तहा
सोचती हूँ ऐ चाँद आज तेरी तरह रहू मुसाफिर बनके
किसीकी तलाशमे भटकती है जैसे मेरी रूह
इंतजार के पल गिनके...
An oil painting on canvas.....




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