मन जो माँगता है पाता नहीं..
जिसकी चाह है उसे बोल नहीं सकता
मन जो नहीं माँगता वो पाता है
जिसकी चाह नहीं उसे भी नहीं बोल सकता
इस माँगने और पानेके सिलसिलेमे
चाह और अनचाह्की कश्म कश में
क्यों भटकता और भटकाता है ये मन
ऐ मेरे भटकते और भटकाते मन
तू खुदही अपनी डोर पकडले
और अपनी भटकन को खुदही थाम ले
क्योंकि इस भटकन का कोई उपाय नहीं
जिसकी जड़ तू है मेरे मन
मेरी उलझनोसे तू ही सुकून दिला दे अब
ऐ मेरे भटकते और भटकाते मन
तू खुदही अपना रास्ता ढूंढ़ ले
जो तुझे इस भटकन और उलझन से मुक्ति दिला दे.....
......अमिता.......

My Sea Scape In Water Colors



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